"प्रेमिका का पत्र", को प्रतिलिपि पर पढ़ें :
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मैं आधुनिक युग की नारी हूँ, कमजोर नही हूँ मैं, सीमा को लांघना सीखा नही कभी, ऐसे संस्कार मुझे मिले नही, पहनती हूँ जीन्स टॉप भले ही, मगर बुजुर्गों का सम्मान करना सीखा है मैंने, को...
ये मेरा मन उदास सा क्यों है, सब के साथ हूँ। मगर क्यों एक भ्रम जाल सा बन गया है। मैंने भी महसूस किया ये बदलाव हैं। क्यों मुझे कुछ समझ नही आता। जितना सुलझा रही हूं ये उलझे हुऐ रिश...
ज़िन्दगी यू हर कदम पर साथ चलती रही कभी रुकी हर रोज नया तजुर्बा मिला मुझे कभी अपनो ने साथ छोड़ा कभी अपनो से ही दर्द मिला मेरा ये सफर कभी रुकेगा नही। "उपासना पाण्डेय" हरदोई (उत्तर प्रदेश)
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